• Lumbini 24 शनिबार, साउन २३, २०७८
  • कुछ तेरे, कुछ मेरे

     

    अजय पाठक

     

    अंतर्मन के भोज पत्र पर,

    गीत लिखे बहुतेरे

    सजनी, कुछ तेरे, कुछ मेरे. . .

    जब-जब सूरज को देखूँ मैं,

    अंजानी-सी लगन लगे।

    तेरे पथ की रखवाली में,

    रात-रात भर नयन जगे।

    दुविधाओं में घिरे हुए दिन,

    चिंताओं के फेरे

    सजनी, कुछ तेरे, कुछ मेरे. . .

    मुझको देख विहँसता चंदा

    जब-जब आधी रात का,

    पात-पात बिखरा जाता है

    मौसम झंझावात का।

    इन लम्हों ने मटमैले-से

    कितने चित्र उकेरे।

    सजनी, कुछ तेरे, कुछ मेरे. . .

    अलकों पर सपनों के मोती,

    झरते धीरे-धीरे।

    भीतर संचित है कितने ही,

    माणिक-मुक्ता-हीरे।

    मुझको बाँध लिया करते हैं,

    इंद्र धनुष के घेरे

    सजनी, कुछ तेरे, कुछ मेरे. . .

    अंतर्मन के भोज पत्र पर,

    गीत लिखे बहुतेरे

    सजनी, कुछ तेरे, कुछ मेरे . . .